हर रोज़ रात रूठ जाती है,
उसकी याद में हर बार, बस बीत जाती है,
चाहता बहुत हूँ 'एक बार' रात को मनाने की,
मगर रात की हर शुरुवात में, 'वो' चली आती है.
हर रोज़ रात रूठ जाती है.
हर रोज़ बंद करता हूँ आंखे, रात का साथ निभाने को,
मगर बंद आंखे में ख्वाबो का हाथ थाम,वो फिर जाग जाती है.
जब भी होता हूँ रात में, तन्हाई के शोर के साथ,
वो दिन में हुई हमारी 'नज़रों की बात' के एहसास से, फिर मुझे उस महफ़िल के मजधार कर जाती है,
हर रोज़ रात रूठ जाती है.
जब भी करता हूँ सवाल अपनी हर गुज़र रही रात से,
वो जाते हुए 'बस एक बार पलट कर',फिर दे देती है जवाब उन सारे सवाल के.
जब भी होता हूँ बेचैन रात के अँधेरे में, उन 'अनकहे जज्बातों' के वार से,
कर देती है वो एक 'अजीब से सुकून' से रूबरू ,लेकर 'मेरे नाम' के अल्फाजो को बस 'थोड़े से प्यार से',
हर रोज़ रात रूठ जाती है.
जब भी करता हूँ बात मेरी इस हमराज़ रात से,
वो हर बात में कहती है- कब तक चाहोगे उसे,बिना उसकी चाहत के इकरार से,
उफ्फ्फ, 'उस दिन' चाँद कुछ जादा ही चमकने लगता है अपनी चांदनी के 'साथ' से,
और रात फिर रूठ जाती है बस मेरी एक 'हल्की सी मुस्कान' से......
उसकी याद में हर बार, बस बीत जाती है,
चाहता बहुत हूँ 'एक बार' रात को मनाने की,
मगर रात की हर शुरुवात में, 'वो' चली आती है.
हर रोज़ रात रूठ जाती है.
हर रोज़ बंद करता हूँ आंखे, रात का साथ निभाने को,
मगर बंद आंखे में ख्वाबो का हाथ थाम,वो फिर जाग जाती है.
जब भी होता हूँ रात में, तन्हाई के शोर के साथ,
वो दिन में हुई हमारी 'नज़रों की बात' के एहसास से, फिर मुझे उस महफ़िल के मजधार कर जाती है,
हर रोज़ रात रूठ जाती है.
जब भी करता हूँ सवाल अपनी हर गुज़र रही रात से,
वो जाते हुए 'बस एक बार पलट कर',फिर दे देती है जवाब उन सारे सवाल के.
जब भी होता हूँ बेचैन रात के अँधेरे में, उन 'अनकहे जज्बातों' के वार से,
कर देती है वो एक 'अजीब से सुकून' से रूबरू ,लेकर 'मेरे नाम' के अल्फाजो को बस 'थोड़े से प्यार से',
हर रोज़ रात रूठ जाती है.
जब भी करता हूँ बात मेरी इस हमराज़ रात से,
वो हर बात में कहती है- कब तक चाहोगे उसे,बिना उसकी चाहत के इकरार से,
उफ्फ्फ, 'उस दिन' चाँद कुछ जादा ही चमकने लगता है अपनी चांदनी के 'साथ' से,
और रात फिर रूठ जाती है बस मेरी एक 'हल्की सी मुस्कान' से......
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