Saturday, October 22, 2011

"पूँछ-पुराण" by sant veer

एक बार धीर कहे संत वीर से |
की हे संत क्या हो,अगर हर मनुष्य को हो एक पूँछ ?

"संत- वीर" पड़े सोच में -हर मनुष्य को हो एक पूँछ |
फिर संत बोले की -हे धीर इस धरती पे ऐसा संभव हो जाएगा |
हर मनुष्य एक पूँछ पा के अपने आप  को stylo कहलवायेगा  ||

उन्  पूंछो के  होंगे  कई  प्रकार और सभी के होंगे अपने आकार |
किसी के पास  होगी  tiger पूँछ  तो  किसी  के  पास   बकरी  पूँछ |
कोई होगा हाँथी पूँछ  का  मालिक  तो  कोई  बिल्ली पूँछ से  होगा  सम्मानित ||

पूंछो  की  होगी  अपनी  style , हर  मनुष्य  की  होगी  पूंछो  वाली  smile ||

हर पूंछो के होंगे  salient features और  हर  feature define many creature |
जैसे अगर मनुष्य  है  खुश   तो  उसकी   पूँछ  george w. bush |
अगर  मनुष्य  है  रुष्ट  तो  उसकी  पूँछ  ओसामा  जैसे  दुष्ट ||

और  अगर  मनुष्य  है  प्रेम  में  तो  उसकी  पूँछ  होगी  दिल  के  shape में |
और  अगर मनुष्य  है  प्रेम  वियोग  में  तो  तीर  भी  होगा  दिल  के  frame में ||

पूँछ  पुराण  सुन  धीर  हुआ  चकित ,उसका मन  पूंछो  के  लिए  हुआ  व्यथित,
और वह बोला  हे  संत  ये  कैसा है  अत्याचार पूंछो  का  बिना  वस्त्रो के ही किया  प्रचार
"संत-वीर"  हुए  क्रोध  से  लाल ,और बोले हे  मुर्ख  shut up your 'मुह',
first let me define everything नहीं  तो  क्या  एक  slap मुह  पे  दूं .
फिर  "संत-वीर"  बोले  सुनो  धीर -

पूंछो  का  होंगा  अपना  सम्मान  वस्त्रो  का  भी  होगा  इसमें  योगदान |
पूंछो  के  लिए  भी  होंगी  अनेक  designer,बड़े - बड़े  retail stores और  उनके  पूछ  shows ||

पूंछो  के  लिए   भी  बनेंगी dresses  |
everything should b stylish अब चाहे वो short हो या latest |
पूंछो  के लिए  बनेंगी  बड़े -बड़े  saloon in which every पूँछ  will b totally groomed ||

पुरषों की  पूंछो  का  बालो  की  होंगी  अपनी  style उसी के  basis पे  होगी  उनकी  पूरी  personality clarify |
जैसे  रौबदार  पुरुष  की  पूँछ  होग- रौबदार, उसके  बाल  होंगे  लम्बे  लच्छेदार |
romantic मिजाज  वाले  पुरुष  की  पूँछ  होंगी-romantic उसके  बाल  होंगे  soft और seductive |
उल्लू  पुरुष  की  पूँछ  भी  उल्लू  अब  बाल  के  लिए  क्या  कहू  जैसे  घुंघराले  घुंघरू ||

स्त्रियों की  पूँछ  के  तो  क्या  कहने ,उनके  लिए  होंगे  diamond और  सोने  के गहने |
इनकी  पूंछो  के  लिए  होंगे  अलग  से dressing table जिसमे  होंगे  पूँछ  liner,maskaara और  कई cosmetic-label |
स्त्रियाँ  पूंछो  की  waxing करवाएंगी  और  उसे  दिखाने  का  लिए  short पूँछ  dress पहिन इतरायेंगी ||

इतनी  व्याख्या  के  बाद  संत  हुए  शांत  और  वीर  को  कुछ  सोचते  देख  उनके  चेहरे  पे  आई  मुस्कान,
फिर  वो  बोले  हे  वीर  मत  हो  इस  दिखावे  की  पूँछ-शान  के  कदरदान ,
ये  तो  सिर्फ  छलावा है  पूंछो  से  भी  भला क्या कोई  style स्तातेमेंट बन पाया है,
पूँछ  तो  है  बस  जानवरों  की  पहचान  और  तुम  हो एक  इंसान .

तो कृपया  आप  सभी  पाठक  भी  न  मुस्कुराए  और  अपनी -अपनी  ख्याली- पूँछ  को  ख्यालो  से  उडाये .
धीर - तो  बोलो  "संत-वीर"  की  जय ....



Sunday, September 25, 2011

हर रोज़ रात रूठ जाती है

हर रोज़ रात रूठ जाती है,
उसकी याद में हर बार, बस बीत जाती है,
चाहता बहुत हूँ 'एक बार' रात को मनाने की,
मगर रात की हर शुरुवात में, 'वो' चली आती है.
हर रोज़ रात रूठ जाती है.

हर रोज़ बंद करता हूँ आंखे, रात का साथ निभाने को,
मगर बंद आंखे में ख्वाबो का हाथ थाम,वो फिर जाग जाती है.
जब भी होता हूँ रात में, तन्हाई के शोर के साथ,
वो दिन में हुई हमारी 'नज़रों की बात' के एहसास से, फिर मुझे उस महफ़िल के मजधार कर जाती है,
हर रोज़ रात रूठ जाती है.

जब भी करता हूँ सवाल अपनी हर गुज़र रही रात से,
वो जाते हुए 'बस एक बार पलट कर',फिर दे देती है जवाब उन सारे सवाल के.
जब भी होता हूँ बेचैन रात के अँधेरे में, उन 'अनकहे जज्बातों' के वार से,
कर देती है वो एक 'अजीब से सुकून' से रूबरू ,लेकर 'मेरे नाम' के अल्फाजो को बस 'थोड़े से प्यार से',
हर रोज़ रात रूठ जाती है.

जब भी करता हूँ बात मेरी इस हमराज़ रात से,
वो हर बात में कहती है- कब तक चाहोगे उसे,बिना उसकी चाहत के इकरार से,
उफ्फ्फ, 'उस दिन' चाँद कुछ जादा ही  चमकने लगता है अपनी चांदनी के 'साथ' से,
और रात फिर रूठ जाती है बस मेरी एक 'हल्की सी मुस्कान' से......

Sunday, September 11, 2011

अए चाहत मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ......

अए चाहत मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ......
यू ख्वाहिशो के बोझ से आज थोड़ा झुक गया हूँ.
थक गया हूँ हर रोज़ को "काश" से सवारते,
अब तो शायद खुद से भी और शायद गिर गया हूँ,
चाहता हूँ  "कुछ" जीत कर हर "हार" को समझाना...
पर अब तो कुछ जीतने क़ि प्रीत ही हर रोज़ हारती है...

अए चाहत मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ....

चाहता हूँ नींद में सुकून को तलाशना,
पर अब तो हर "तलाश" में टूटते ख्वाब ही सवारता हूँ.....
चाहता हूँ एक बार "थक-कर", "उनकी" गोद में सोना,
पर उनकी निगाह में, हम कभी थकते ही नहीं.....
थक गया हूँ आगाज़ की "निगाहों" से मंजिले निहार कर,
पर अब तो आगाज़ क़ि चाहत ने ही कई "रस्मे" निभाई है....

अए चाहत मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ.......

"तुम जैसा हसीन इस दुनिया में कोई नहीं...
तेरी सादगी में भी कहीं कोई कमी नहीं....
और तुम्हारी निगाहों से निगाहें मिलने पर -
ऐसे धड़का मेरा दिल क़ि जैसे कभी धड़का ही नहीं"
चाहता हूँ एक बार "उसे" ये "सब" बताना
पर मेरी "चाहतों" क़ि "चाहत" अभी मेरी है हे नहीं... 

अए "चाहत" मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ ......