Sunday, September 11, 2011

अए चाहत मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ......

अए चाहत मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ......
यू ख्वाहिशो के बोझ से आज थोड़ा झुक गया हूँ.
थक गया हूँ हर रोज़ को "काश" से सवारते,
अब तो शायद खुद से भी और शायद गिर गया हूँ,
चाहता हूँ  "कुछ" जीत कर हर "हार" को समझाना...
पर अब तो कुछ जीतने क़ि प्रीत ही हर रोज़ हारती है...

अए चाहत मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ....

चाहता हूँ नींद में सुकून को तलाशना,
पर अब तो हर "तलाश" में टूटते ख्वाब ही सवारता हूँ.....
चाहता हूँ एक बार "थक-कर", "उनकी" गोद में सोना,
पर उनकी निगाह में, हम कभी थकते ही नहीं.....
थक गया हूँ आगाज़ की "निगाहों" से मंजिले निहार कर,
पर अब तो आगाज़ क़ि चाहत ने ही कई "रस्मे" निभाई है....

अए चाहत मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ.......

"तुम जैसा हसीन इस दुनिया में कोई नहीं...
तेरी सादगी में भी कहीं कोई कमी नहीं....
और तुम्हारी निगाहों से निगाहें मिलने पर -
ऐसे धड़का मेरा दिल क़ि जैसे कभी धड़का ही नहीं"
चाहता हूँ एक बार "उसे" ये "सब" बताना
पर मेरी "चाहतों" क़ि "चाहत" अभी मेरी है हे नहीं... 

अए "चाहत" मेरी सुन ज़रा आज थोड़ा थक गया हूँ ......



1 comment:

  1. awesumly agar koi wrd hota hai to waisa hi written ...bus ...ye aadat banaye rakho.....hawayein badi tej hai aag bujhne me deri nahi lagti

    ReplyDelete